परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के चातुर्मास से जुड़ी एक विशेष एकादशी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम करते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं।
इसी परिवर्तन या एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व की ओर करवट लेने की मान्यता के कारण इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसे पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान विष्णु करवट क्यों बदलते हैं?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चातुर्मास के दौरान योगनिद्रा में रहते हैं। चातुर्मास के बीच भाद्रपद शुक्ल एकादशी पर भगवान विष्णु का करवट बदलना इसी योगनिद्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यता है।
इसलिए इस दिन भगवान के करवट बदलने को केवल शयन की एक अवस्था में परिवर्तन नहीं, बल्कि चातुर्मास की दिव्य लीला में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखा जाता है।
परिवर्तिनी और पार्श्व एकादशी नाम कैसे जुड़े?
‘परिवर्तिनी’ नाम भगवान विष्णु के करवट बदलने अर्थात परिवर्तन करने से जुड़ा है। वहीं ‘पार्श्व’ का संबंध उनके एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व की ओर करवट लेने की मान्यता से माना जाता है। इसी कारण इस एकादशी के लिए दोनों नाम प्रचलित हैं।
धार्मिक मान्यता में भगवान विष्णु का यह करवट बदलना चातुर्मास की विशेष आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण और व्रत-पूजन करके उनकी कृपा की प्रार्थना करते हैं।
निष्कर्ष
परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के करवट बदलने की मान्यता चातुर्मास की योगनिद्रा और उनके एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व की ओर परिवर्तन से जुड़ी है। इसी कारण इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी और पार्श्व एकादशी पड़ा।
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